निम्नलिखित में से कौनसा/से राजस्थानी लोक संगीत का/के सुषिर वाद्य यंत्र है/हैं ?
(अ) अलगोजा
(ब) भपंग
(स) सतारा
(द) नड़
कूट -
[EO RO (Re Exam) 23 मार्च 2025]
👉 अलगोजा, सतारा, नड़ — यह सभी सुषिर वाद्य यंत्र हैं; इनका निर्माण वादन हवा (श्वास) से ध्वनि उत्पन्न करने के लिए होता है।
👉 भपंग — तत् वाद्य की श्रेणी में आता है।
👉 अतः सही उत्तर है — (अ), (स), (द)।
📝 अतिरिक्त जानकारी
सुषिर वाद्य — अलगोजा, पूंगी, शहनाई, सतारा, बांसुरी, मशक, नड़, मोरचंग, सुरनई, तुरड़ी, मुरली, बाकिया, तरपी, कानी, करणा, सींगा, भूगल, रणभेरी, शंख, बरगू, नागफनी, पेली, टोये, हरनाई।
'तारपी' वाद्ययंत्र का प्रयोग मुख्यतः किस जाति के द्वारा किया जाता है ?
[व्याख्याता (तकनीकी) 12.03.2021]
👉 मांगणियार कमायचा और खड़ताल वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं, जोगी जाति के लोग सारंगी और भपंग वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं,नट जाति के लोग ढोलक और मंजीरा वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं
निम्नलिखित में से कौनसा सुषिर वाद्य है ?
[Head Master 11.10.2021]
👉 सतारा — सुषिर वाद्य यंत्र; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रित वाद्य; दो लंबी बांसुरियाँ होती हैं — एक आधार स्वर देती है, दूसरी के छः छेद दोनों हाथों से बजाए जाते हैं; इच्छित छेद बंद कर सप्तक में परिवर्तन संभव; जैसलमेर व बाड़मेर के गड़रिया व मेघवाल जाति द्वारा उपयोग।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 रावण हत्था — भोपों का प्रमुख वाद्य; बड़े नारियल की कटोरी पर खाल मढ़कर बनाया जाता है; बाँस की डांड, 9 तार; गज (घोड़े की पूँछ के बालों से बना) से बजाते हैं; गज के सिरे पर घुँघरू बँधे होते हैं; पाबूजी की फड़ बाँचते समय प्रयोग होता है।
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा जैसा; दो तुम्बे, बीच में बाँस की लम्बी नली, 4 तार; खड़े होकर गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों में प्रचलित; देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा में उपयोग।
👉 सुरमंडल — तत् वाद्य यंत्र; पश्चिमी राजस्थान (विशेषकर जैसलमेर क्षेत्र) में मांगणियार जाति द्वारा उपयोग; लगभग दो से ढाई फुट लंबा।
देवनारायण जी की फड़ के वाचन के साथ किस वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ?
[मूल्यांकन अधिकारी 23.08.2020]
👉 जन्तर — देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा वाचन में इसका प्रयोग होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 तत् वाद्य; आकार में वीणा जैसा; इसमें दो तुम्बे व बीच में बाँस की लम्बी नली होती है; इसमें चार तार होते हैं, जिन्हें उँगलियों से आघात कर बजाया जाता है; खड़े होकर गले में लटकाकर वादन किया जाता है; यह गूजर भोपों में प्रचलित है
निम्न में से कौन सा सुषिर वाद्य नहीं है ?
[Deputy Jailor Exam 13.07.2025]
👉 रवाज़ को सुषिर वाद्य नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें फूँक मारकर ध्वनि उत्पन्न नहीं की जाती।
👉 यह एक तात (तार) वाद्य है, जिसमें ध्वनि तारों को छेड़ने से उत्पन्न होती है।
👉 सुषिर वाद्य वे होते हैं जिनमें हवा फूँककर ध्वनि निकाली जाती है, जैसे बांसुरी और शहनाई।
✍️ सही उत्तर है – रवाज़
अलगोजा वाद्य यंत्र में कितने छिद्र होते हैं ? delete Question
सहायक आचार्य [30.05.2019]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य; बांसुरी के समान; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर एक साथ बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में लोकप्रिय।
निम्नलिखित में से कौन सा सुषिर वाद्य यंत्र नहीं है ?
[ATO परीक्षा 27.07.2021]
👉 कमायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर व बाड़मेर क्षेत्र में लोकप्रिय; स्वरूप में सारंगी जैसा; इसमें 27 तार होते हैं, जो बकरी की आँतों व घोड़े के बालों से बनाए जाते हैं; इसमें दो मोर व नौ मोरनियाँ होती हैं; इसका वादन माँगणियार कलाकार करते हैं; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 सतारा — सुषिर वाद्य; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रित रूप; दो लंबी बांसुरियाँ होती हैं — एक में आधार स्वर, दूसरी में 6 छेद; छेद बंद कर स्वर परिवर्तन संभव; जैसलमेर-बाड़मेर के गड़रिया व मेघवाल जाति इसका उपयोग करते हैं।
👉 बांकिया — सुषिर वाद्य; पीतल से निर्मित; वक्राकार होने के कारण बांकिया कहलाता है; मांगलिक अवसरों व त्योहारों में मंदिरों में ढोल के साथ बजाया जाता है; इसका वादन सरगरा जाति के लोग करते हैं।
निम्न में से कौनसा वाद्य अलगोज़ा, बांसुरी एवं शहनाई का समन्वित रूप है ?
[Research Assistant 10.07.2025]
👉 सतारा एक विशिष्ट लोक वाद्य है, जो अलगोजा, बाँसुरी और शहनाई के गुणों का समन्वित रूप माना जाता है।
👉 यह एक ऊर्ध्व (vertical) बाँसुरी है, जिसमें दो बांसुरियों को एक साथ बजाया जाता है—एक श्रुति (ड्रोन) हेतु और दूसरी मुख्य स्वर के लिए।
👉 सतारा को मुख्य रूप से चरवाहे बजाते हैं और यह ग्रामीण लोकजीवन का अभिन्न वाद्य है।
👉 इसका उपयोग विशेष रूप से जोधपुर और बाड़मेर जैसे पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्रों में अधिक होता है।
✍️ सही उत्तर है – सतारा
'मोरचंग वाद्य' के बारे में निम्नलिखित में से कौनसा/से कथन सही है/हैं ?
I. यह लोहे का बना छोटा सा वाद्य है।
II. मोरचंग को होठों के बीच रखकर बजाया जाता है।
III. यह सुषिर वाद्य की श्रेणी में आता है।
IV. इसमें 27 तार होते हैं।
[पुरालेखपाल परीक्षा 03.08.2024]
👉 मोरचंग — सुषिर वाद्य; मोर की आकृति वाला वाद्य; लोहे/पीतल से बना; मध्य में मजबूत पतला तार; एक सिरा मुँह में रखकर श्वास दी जाती है, दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 चरवाहे पशु चराते समय मनोरंजन हेतु बजाते हैं; अन्य नाम — माउथहार्प, मोरचंग, मोरसिंग, वरगन, खोमस, परमुपिल्ल, डोरोम्ब, ज्यूशार्प, जॉ हार्प।
निम्नलिखित में से कौनसा तत् वाद्य यंत्र है ?
[सहायक आचार्य परीक्षा 08.09.2024]
👉 भपंग — कटे हुए तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है; चमड़े में छेद कर तार को खूंटी से बांधते हैं; काँख में दबाकर, तांत को खींचकर और लकड़ी से प्रहार कर बजाते हैं। मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य; जहर खाँ इसके अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार हैं।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 मोरचंग — मोर की आकृति वाला वाद्य; लोहे या पीतल से बना; मध्य में पतला तार होता है; मुँह में रखकर श्वास दी जाती है, दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है; चरवाहे मनोरंजन हेतु बजाते हैं; अन्य नाम — माउथहार्प, मोरचंग, मोरसिंग, वरगन, खोमस आदि।
👉 खड़ताल — खड़ताल राजस्थान का एक लोकप्रिय और पारंपरिक घन वाद्य यंत्र है, जो पश्चिम में राजस्थान के मंगनियार समुदाय के लोग गायन के साथ प्रयोग करते हैं, यह लकड़ी के चार टुकड़ों से बना होता है जो शीशम के बने होते है
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) प्रसिद्ध वादक; भील व कालबेलिया जातियाँ उपयोग करती हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक।
'कुण्डी वाद्य' किस प्रकार का वाद्य यंत्र है ?
[Asst. Prof. (Paper -III) 07.12.2025]
🔹 व्याख्या
👉 कुण्डी वाद्य यंत्र मुख्य रूप से मिट्टी या लकड़ी के अर्धवृत्ताकार पात्र से बना होता है।
👉 इसके खुले हुए मुख को खाल से मढ़कर बनाया जाता है, जिसे डंडों से बजाते हैं।
👉 यह अवनद्ध (ताल) श्रेणी का वाद्य है, जो गरासिया जनजाति में अधिक प्रचलित है।
👉 इसके छोटे रूप को कुण्डी और बड़े स्वरूप को अक्सर नगाड़ा या डमरू से जोड़ा जाता है।
✍️ सही उत्तर है – ताल
निम्नलिखित में से कौन सा कथन कामायचा के बारे में असत्य है ?
[पशु चिकित्सा अधिकारी 02.08.2020]
👉 कामायचा — तत् वाद्य यंत्र; इसे वायलिन का अग्रज वाद्य माना जाता है
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय; स्वरूप में सारंगी के समान; इसमें 27 तार (बकरी की आँतों और घोड़े के बालों से निर्मित) होते हैं; इसमें दो मोर व नौ मोरनियाँ होती हैं; इसका प्रमुख रूप से प्रयोग माँगणियार कलाकार करते हैं; विख्यात वादक — कमल साकर खाँ। वायलिन का अग्रगणी राजस्थान के प्रसिद्ध लोक वाद्य यंत्र रावण हत्था को माना जाता है
निम्नलिखित में से कौनसा सुषिर वाद्ययंत्र नहीं है?
[वरिष्ठ अध्यापक (पेपर -I) 29.12.2024]
👉 भपंग — तत् वाद्य; कटा हुआ तुम्बा जिस पर चमड़ा मढ़ा होता है; चमड़े में छेद कर तार को खूंटी से बाँधते हैं; काँख में दबाकर तांत को खींचकर या ढीला छोड़कर, लकड़ी के टुकड़े से बजाते हैं; मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य; प्रसिद्ध कलाकार — जहर खाँ।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 मशक — सुषिर वाद्य; चमड़े की सिलाई से बना; मुँह से हवा भरकर, नीचे की नली से ध्वनि निकालते हैं; ध्वनि पूंगी जैसी; पूर्व में विवाह अवसरों पर, अब पुलिस/सुरक्षा बलों के बैंड में प्रयोग।
👉 नड़ — सुषिर वाद्य; लगभग ढाई फीट लंबा; कैर/कगौर की लकड़ी से निर्मित; 4-6 छेद; पश्चिमी राजस्थान के चरवाहों व भोपों में लोकप्रिय; प्रसिद्ध कलाकार — करणा राम भील; राजस्थान सरकार द्वारा सम्मानित, बाद में हत्या।
👉 सतारा — सुषिर वाद्य; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रण; दो लंबी बांसुरियाँ — एक में आधार स्वर, दूसरी में 6 छेद; इच्छित सप्तक परिवर्तन संभव; जैसलमेर-बाड़मेर के गड़रिया व मेघवाल जाति द्वारा प्रयोग।
पाबूजी की कथा के साथ कौनसा लोकवाद्य जुड़ा हुआ है ?
[रसायनज्ञ पुरालेख विभाग 05.08.2024]
👉 रावणहत्था — भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर तैयार; बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े के बालों से) से वायलिन की तरह बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू; पाबूजी की फड़ में उपयोग होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 पूंगी — सुषिर वाद्य; बीन के नाम से भी प्रसिद्ध; कालबेलिया जाति द्वारा सर्प मोहित करने हेतु; थार में जोगी व सपेरों द्वारा बजाई जाती है; लोकी के तुम्बे में दो नालियाँ — एक में 3 छेद, दूसरी में 9 छेद।
👉 भपंग — तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर तैयार; तार को खूंटी से बाँधते हैं; काँख में दबाकर तांत को खींचकर लकड़ी से बजाते हैं; मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य; अंतर्राष्ट्रीय कलाकार — जहर खाँ।
मुँह के द्वारा बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों में निम्नलिखित में से कौन सा नहीं है ?
[उपनिरीक्षक (SI) 13.09.2021]
👉 रवाज — तत् वाद्य; सारंगी श्रेणी का वाद्य; 12 तार होते हैं — 4 तांत के, 1 सन की डोरी का, 8 तरबों के। मेवाड़ क्षेत्र में राव व भाटों में लोकप्रिय।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) प्रसिद्ध वादक; भील व कालबेलिया जातियाँ उपयोग करती हैं।
👉 सतारा — सुषिर वाद्य; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रित वाद्य; 2 बांसुरियाँ होती हैं; गड़रिया व मेघवाल (जैसलमेर-बाड़मेर) जाति द्वारा उपयोग।
👉 मशक — सुषिर वाद्य; चमड़े से बना; मुँह से हवा भरकर बजाया जाता है; ध्वनि पूंगी जैसी; पहले विवाहों में उपयोग, अब पुलिस/सुरक्षा बलों के बैंड में।
'मदील' एक प्रकार का- [*]
वरिष्ठ अध्यापक 2010 पेपर -I GK (ENG)
निम्नलिखित में से कौन सा द्यनवाद्य है ?
[Protection Officer 28.01.2023]
🔹 व्याख्या:
👉 टंकोरा — घन वाद्य; कांसा, तांबा, जस्ता मिश्रण की मोटी गोल पट्टिका; आगे-पीछे हिलाकर, लकड़ी के डंडे से बजाया जाता है; अन्य नाम — घंटा, घड़ियाल; समय संकेतक ध्वनि हेतु प्रयोग, टन-टन ध्वनि के कारण टंकोरा कहलाता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कुंडी — तालवाद्य; आदिवासी समुदायों में प्रचलित; एक/दो लकड़ी के टुकड़ों से बना खोखला या आधा खोखला डिब्बा; हाथ से बजाकर विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न होती है।
निम्नलिखित में से कौन सा सुषिर वाद्य नहीं है ?
[Deputy Commandant 23.08.2020]
👉 सुरमण्डल — तत् वाद्य यंत्र; पश्चिमी राजस्थान (विशेषतः जैसलमेर क्षेत्र) में मांगणियार जाति द्वारा प्रयोग; आकार में लगभग दो से ढाई फुट लंबा।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 सुरनाई — शहनाई व टोटो से मिलता-जुलता लोक वाद्य; मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है; प्रसिद्ध वादक — पेपे खाँ।
👉 सतारा — सुषिर वाद्य; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रण; दो लंबी बांसुरियाँ — एक आधार स्वर, दूसरी में 6 छेद; सप्तक परिवर्तन संभव; जैसलमेर-बाड़मेर के गड़रिया व मेघवाल जाति द्वारा प्रयोग।
👉 नड़ — सुषिर वाद्य; लगभग ढाई फीट लंबा; कैर/कगौर की लकड़ी से निर्मित; 4-6 छेद; पश्चिमी राजस्थान के चरवाहों व भोपों में लोकप्रिय; प्रसिद्ध कलाकार — करणा राम भील; राजस्थान सरकार द्वारा सम्मानित, बाद में हत्या।
निम्नलिखित में से कौन-सा वाघ 'तत वाद्य' नहीं है ?
[PTI Grade -II (RPSC) 2011]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य; स्वरूप में बांसुरी जैसा; इसमें 4 से 7 छेद होते हैं; दो अलगोजे एक साथ मुँह में रखकर बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) इसे नाक से भी बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील और कालबेलिया जातियों में अधिक प्रचलित।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 रावण हत्था — भोपों का प्रसिद्ध वाद्य; बड़े नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर तैयार किया जाता है; बाँस की डांड में 9 तार बाँधे जाते हैं; गज (घोड़े की पूँछ के बालों से निर्मित) से वायलिन की तरह बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू लगे होते हैं; पाबूजी की फड़ गायन में इसका उपयोग होता है।
👉 जन्तर — तत् वाद्य; आकार में वीणा के समान; दो तुम्बे व बीच में बाँस की लंबी नली होती है; इसमें 4 तार होते हैं, जिन्हें उँगलियों से आघात कर बजाया जाता है; खड़े होकर गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों में प्रचलित; देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा के दौरान प्रयोग किया जाता है।
निम्नलिखित में से कौन सा वाद्य यन्त्र तत् वाद्य नहीं है ?
[LDC (RPSC) 23.10.2016]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का लोकप्रिय लोक वाद्य; स्वर में बांसुरी जैसा; 4-7 छेद होते हैं; दो अलगोजे मुँह में रखकर एक साथ बजाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में प्रचलित।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 रावण हत्था — भोपों का वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर तैयार; बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े की पूँछ के बालों से) से बजाया जाता है; पाबूजी की फड़ में प्रयोग।
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा जैसा; दो तुम्बे, बाँस की नली, 4 तार; खड़े होकर गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों द्वारा देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा में उपयोग।
👉 कामायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर-बाड़मेर में प्रचलित; सारंगी जैसा; 27 तार (बकरी की आँतों व घोड़े के बाल से); दो मोर व नौ मोरनियाँ; माँगणियार कलाकारों द्वारा बजाया जाता है; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
निम्न में से लोक वाद्य यंत्रों का कौन सा समूह सुमेलित नहीं है ?
[कृषि अधिकारी 20.04.2025]
👉 दिए गए वाद्ययंत्रों की सूची में रावणहत्था, जंतर, और सतारा—ये सभी तार वाद्य (string instruments) की श्रेणी में आते हैं।
👉 जबकि निशान एक ताल वाद्य (percussion instrument) है, जो ढोल जैसे वाद्य का रूप है।
👉 इसलिए इस समूह में निशान अन्य वाद्यों से मेल नहीं खाता।
✍️ सही उत्तर है – रावणहत्था, जंतर, निशान, सतारा
वाद्य यंत्र 'अरबी ताशा' मेवाड़ मेवाड़ के सैनिक यंत्रो में कब शामिल किया गया ?
[कृषि अधिकारी 29.08.2022]
👉 अरबी ताशा चमड़े से बना वाद्य यंत्र जो गले में लटका कर डांडिया से बजाया जाता है
फड़ बांचते समय किस वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ?
[Asst. Jailor 15.03.2016]
👉 रावणहत्था — भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर, बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े के बालों से) से वायलिन की तरह बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू; पाबूजी की फड़ में उपयोग होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 मांदल — अवनद्ध वाद्य; मृदंग जैसा; मिट्टी का बना, ऊपर हिरण/बकरी की खाल; खाल पर जौ का आटा चिपकाकर बजाते हैं; भील व गरासिया जातियों में प्रचलित; मोलेलां गाँव में बनता है।
👉 ढोल — लोहे/लकड़ी के घेरे पर दोनों ओर चमड़ा; डोरियों से कसा जाता है; गले में लटकाकर डंडे से बजाते हैं; मांगलिक अवसर, गैर नृत्य, कच्छी घोड़ी व ढोल नृत्य में प्रयोग।
👉 सारंगी — तत् वाद्य; सागवान/कैर/रोहिडे की लकड़ी से बनी; बकरी की आँतों के तार; गज (घोड़े के बालों से) से बजाई जाती है; बिरोजा पर घिसकर ध्वनि उत्पन्न होती है।
भूँगल, बर्गू क्या हैं ?
[Development Officer 29.07.2025]
👉 भूँगल और बर्गू, दोनों ही राजस्थान के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र हैं।
👉 इनका उपयोग लोकनृत्यों और सामाजिक उत्सवों में संगीत संगति के लिए किया जाता है।
👉 विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में ये वाद्य लोक-संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
✍️ सही उत्तर है – वाद्य यंत्र
'बाँकिया', 'सिंगी' और 'टोटो' लोकवाद्य किस परम्परा से सम्बद्ध है ?
[लाइब्रेरियन ग्रेड -II [02.08.2020]
👉 बाँकिया, सिंगी, टोटो — सुषिर वाद्य परंपरा से संबंधित हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 इस श्रेणी में अलगोजा, पूंगी, शहनाई, सतारा, बांसुरी, मशक, नड़, मोरचंग, सुरनई, तुरड़ी, मुरली, बाँकिया, तरपी, कानी, करणा, सींगा, भूगल, रणभेरी, शंख, बरगू, नागफनी, पेली, टोये, हरनाई जैसे वाद्य शामिल होते हैं।
'पाबूजी की फड़' में भोपा द्वारा प्रयोग किया जाने वाला लोकवाद्य है
[सहायक कृषि अधिकारी 31.05.2019]
👉 रावण हत्था — वाद्ययंत्र; भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर, बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े के बालों से) से बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू; पाबूजी की फड़ में प्रयोग होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कुंडी — तालवाद्य; आदिवासी समुदायों में प्रचलित; लकड़ी के एक या दो टुकड़ों से बना; हाथ से बजाकर विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
👉 मंजीरा — घन वाद्य; पीतल/ताँबा/काँसा से बना; कटोरीनुमा आकार; रामदेवजी के भोंपे, कामड़ जाति व तेरहताली नृत्य में उपयोग।
👉 पूंगी — सुषिर वाद्य; बीन नाम से भी प्रसिद्ध; कालबेलिया द्वारा सर्प मोहित करने हेतु; थार में जोगी व सपेरों द्वारा बजाई जाती है; लोकी के तुम्बे में दो नालियाँ — एक में 3 छेद, दूसरी में 9 छेद।
“घुरालियों" क्या है ?
[स. सांख्यिकी अधिकारी 27.05.2019]
👉 घुरालियों — कालबेलियों का वाद्य यंत्र; लगभग 5-6 अंगुल लंबी बांस की खपच्ची से बना होता है; एक ओर से छीलकर मुख पर धागा बाँधा जाता है; इसे दांतों के बीच दबाकर धागे के ढील और तनाव से बजाते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 यह कालबेलिया व गरासिया जनजाति का प्रमुख वाद्य है।
लोक वाद्ययंत्र 'चौतारा' के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं निम्नांकित में से सही विकल्प चुनिए :
A. यह चार तारों वाला वाद्ययंत्र है।
B. यह सामान्यतः रामदेवजी के भजन गाने में प्रयुक्त होता है।
[RAS Pre परीक्षा 02.02.2025]
👉 चौतारा — चार तारों वाला वाद्य; आकार में सितार या तानपूरा जैसा; इसका उपयोग रामदेवजी के भजन व नाथपंथी, कामड़ जाति के निर्गुण भजनों में होता है; अतः A और B दोनों कथन सत्य हैं। बाबा रामदेव जी की आराधना में कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा तेरहताली नृत्य के दौरान चौतरा और मंजीरा बजाते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कुण्डी लकड़ी की होती है; तारों का क्रम उल्टा होता है; इसके साथ खड़ताल, मंजीरा, चिमटा आदि वाद्य भी बजते हैं;
----------------एक लोहे और चमड़े से बना वाद्य है जो मन्दिरों में प्रार्थना के समय तथा त्योहारों और धार्मिक उत्सवों के समय बजाया जाता है ।
सहायक आचार्य [ 07.01.2024]
👉 नौबत — चार फुट गहरी अर्द्ध-अण्डाकार कुंडी, भैंसे की खाल से मढ़कर, चमड़े की डोरियों से कसकर बनाई जाती है; लकड़ी के डण्डों से मंदिरों में बजाई जाती है; पूर्व में राजा-महाराजाओं के महलों के मुख्य द्वार पर भी बजाई जाती थी।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 सारंगी — तत् वाद्य; सागवान, कैर या रोहिडे की लकड़ी से बनती है; तार बकरे की आँत के होते हैं; घोड़े की पूंछ के बालों से बनी गज से बजाई जाती है।
👉 तबला — ताल वाद्य; दो ड्रमों की जोड़ी — दायाँ (छोटा), बायाँ (बड़ा); दायाँ दायें हाथ से, बायाँ बायें हाथ से बजाया जाता है; प्रमुख वादक — उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित कृष्णानन्द व्यास, अमृत हुसैन।
👉 सितार — वीणा प्रकृति का वाद्य; भारत के प्रमुख लोकप्रिय वाद्ययंत्रों में; शास्त्रीय से अन्य संगीत तक उपयोग; प्रमुख शैलियाँ — सेनी घराना, इमदादखानी शैली; प्रमुख वादक — पंडित रविशंकर, अनुष्का शंकर, निखिल बनर्जी, विलायत खान, वन्दे हसन, शाहिद परवेज, उमाशंकर मिश्र, बुद्धादित्य मुखर्जी।
रावणहत्था क्या है ?
[वरिष्ठ अध्यापक 21.02.2014]
👉 रावण हत्था — वाद्ययंत्र; भोपों का प्रमुख वाद्य; बड़े नारियल की कटोरी पर खाल मढ़कर बनाया जाता है; बाँस की डांड में खूंटियाँ लगाकर 9 तार बाँधे जाते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 वायलिन की तरह गज (घोड़े की पूँछ के बालों से निर्मित) से बजाया जाता है; गज के अंतिम सिरे पर घुँघरू बँधे होते हैं; पाबूजी की फड़ बाँचते समय प्रयोग होता है।
रावणहत्या क्या है ?
[कृषि अधिकारी 2011]
👉 रावण हत्था — वाद्ययंत्र; भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े की पूँछ के बालों से) से वायलिन की तरह बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू लगे होते हैं; पाबूजी की फड़ में उपयोग होता है।
तेरहताली नृत्यमें किस वाद्ययंत्र का प्रयोग किया जाता है ?
[ACF परीक्षा 2011]
👉 मंजीरा — घन वाद्य यंत्र; पीतल, ताँबा, काँसा की मिश्रित धातु से बना कटोरीनुमा वाद्य; किनारे फैले होते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 रामदेवजी के भोंपे, कामड़ जाति व तेरहताली नृत्य में इसका प्रयोग होता है।
राजस्थान का 'राज्य लोक वाद्य यंत्र कौन-सा है ?
[ACF परीक्षा 2011]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में प्रचलित।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 सारंगी — तत् वाद्य; सागवान, कैर, रोहिडे की लकड़ी से निर्मित; तार बकरी की आँत के; घोड़े की पूँछ के बालों से बनी गज से बजाई जाती है; बिरोजा पर घिसकर ध्वनि उत्पन्न होती है।
👉 झांझ — मंजीरे का बड़ा रूप; 30 सेमी लकड़ी पर लोहे के गोल टुकड़े लगे होते हैं; दो झांझ को एक साथ एक हाथ से बजाते हैं; शेखावाटी क्षेत्र के कच्छी घोड़ी नृत्य में प्रमुख उपयोग।
मांगणियारो द्वारा प्रयुक्त वाद्य यंत्र कौन सा है ?
[कृषि अधिकारी 24.11.2020]
👉 कमायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर-बाड़मेर क्षेत्र में लोकप्रिय; सारंगी समान; 27 तार (बकरी की आँतों, घोड़े के बाल); दो मोर, नौ मोरनियाँ; माँगणियार कलाकारों द्वारा प्रयोग; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा जैसा; दो तुम्बे, बाँस की नली, 4 तार; गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों द्वारा देवनारायण की फड़, बगडावतो में उपयोग।
👉 भपंग — तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है; काँख में दबाकर, तांत खींचकर लकड़ी से बजाते हैं; मेवात क्षेत्र में प्रसिद्ध; कलाकार — जहर खाँ।
👉 रवाज — तत् वाद्य; सारंगी श्रेणी; 12 तार (4 तांत के, 1 सन डोरी, 8 तरबों के); मेवाड़ में राव व भाटों में प्रचलित।
निम्नलिखित में से कौन- सा वाद्य घन वाद्य नहीं है ?
[सहायक कृषि अधिकारी 29.04.2018]
👉 जन्तर — तत् वाद्य; आकार में वीणा जैसा; दो तुम्बे, बीच में बाँस की लंबी नली; 4 तार; उँगलियों से आघात कर बजाते हैं; खड़े होकर गले में लटकाकर उपयोग; गूजर भोपों में लोकप्रिय; देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा में प्रयोग।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 झांझ — मंजीरे का बड़ा रूप; लकड़ी की 30 सेमी छड़ पर लोहे के गोल टुकड़े; दो झांझ एक साथ एक हाथ से बजाते हैं; शेखावाटी के कच्छी घोड़ी नृत्य में प्रमुख प्रयोग।
👉 खड़ताल — कैर-बबूल की लकड़ी में पीतल की छोटी तश्तरियाँ; लकड़ी के टुकड़ों के टकराने से ध्वनि; इकतारे के साथ बजाई जाती है; बाड़मेर-जैसलमेर के मांगणियार जाति का प्रमुख वाद्य; प्रसिद्ध कलाकार — स्व. सद्दीक खाँ।
👉 मंजीरा — घन वाद्य; पीतल/ताँबा/काँसा की मिश्रित धातु से बना; कटोरीनुमा; रामदेवजी के भोंपे, कामड़ जाति, तेरहताली नृत्य में प्रमुख उपयोग।
बांसवाड़ा और डूंगरपुर आदिवासी इलाकों में प्रचलित दुकाको वाद्य की निम्न विशेषताएं हैं.
(A) दीपावली के दिनों में इस वाद्य को बजाया जाता है।
(B) इसे तूंबे या खोखली लकड़ी की सहायता से बनाया जाता है।
(C) वाद्य की प्रकृति अन्य लोक वाद्य "अपंग” या "भपंग" के समान है।
(D) इस वाद्य को डूचा, डुसका, डोसुका, डुचाको भी कहा जाता है
सही कूट का चयन करें -
[Deputy Commandant 11.01.2026]
🔹 व्याख्या
👉
दुकाको
वाद्य
दीपावली में
बजाया
जाता है।
👉
यह
तूंबा/लकड़ी
से निर्मित
होता है।
👉
इसकी
प्रकृति भपंग
वाद्य
के समान
है।
👉
इसे
डूचा,
डुसका
आदि नामों
से जाना जाता
है।
✍️ सही उत्तर है – सभी (A), (B), (C), (D)
निम्न में से तत् वाद्य है :
(i) जन्तर
(ii) रवाज
(iii) भपंग
[सांख्यिकी अधिकारी 25.02.2024]
👉 जन्तर, रवाज, भपंग — ये तीनों (i), (ii), (iii) तत् वाद्य की श्रेणी में आते हैं; स्वरूप व वादन पद्धति के आधार पर इनका उपयोग विभिन्न सांस्कृतिक और लोक परंपराओं में होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा समान; दो तुम्बे, बाँस की नली, 4 तार; गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों द्वारा देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा में प्रयोग।
👉 रवाज — तत् वाद्य; सारंगी श्रेणी; 12 तार — 4 तांत के, 1 सन डोरी, 8 तरबों के; मेवाड़ में राव व भाटों में लोकप्रिय।
👉 भपंग — तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर तैयार; तार को खूंटी से बाँधते हैं; काँख में दबाकर तांत खींचकर लकड़ी से बजाते हैं; मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य; कलाकार — जहर खाँ।
मोरचंग है -
सहायक आचार्य [24.04.2016]
👉 मोरचंग — वाद्य यंत्र; मोर की आकृति वाला; लोहे या पीतल से बना; मध्य में मजबूत पतला तार होता है; एक सिरा मुँह में रखकर श्वांस दी जाती है, दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है; चरवाहे पशु चराते समय मनोरंजन हेतु बजाते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
अन्य नाम — माउथहार्प, मोरचंग, मोरसिंग, वरगन, खोमस, परमुपिल्ल, डोरोम्ब, ज्यूशार्प, जॉ हार्प।
देवनारायण जी के भजन गाने हेतु किस वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ?
[सहायक पुरालेखपाल 03.08.2024]
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा के समान; दो तुम्बे, बीच में बाँस की लम्बी नली, 4 तार; उंगलियों से आघात कर बजाया जाता है; खड़े होकर गले में लटकाकर वादन; गूजर भोपों में प्रचलित; देवनारायण की फड़ व बगडावतो में प्रयोग।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर बजाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; राजस्थान के कई जिलों में प्रचलित; भील व कालबेलिया जातियों में लोकप्रिय।
👉 मंजीरा — घन वाद्य; पीतल/ताँबा/काँसा से बना कटोरीनुमा वाद्य; रामदेवजी के भोंपे, कामड़ जाति, तेरहताली नृत्य में प्रयोग।
👉 मोरचंग — सुषिर वाद्य; मोर की आकृति का; लोहे/पीतल से बना; मध्य में पतला तार; एक सिरा मुँह में रखकर श्वास दी जाती है, दूसरे सिरे पर अंगुली से आघात किया जाता है; चरवाहे मनोरंजन हेतु बजाते हैं; अन्य नाम — माउथहार्प, मोरसिंग, वरगन आदि।
निम्नलिखित में से कौन सा सुषिर वाद्य नहीं है ?
(i) सुरनाई (ii) अलगोजा
(iii) नागफणी (iv) कमायचा
[RAS Pre. 31.10.2015]
सही विकल्प चुनिए :
👉 अवनद्ध वाद्य — तबला, ढोलक, मृदंग, पखावज, नगाड़ा, डमरू, तासा, ढोल, धौसा आदि।
👉 तत् वाद्य — जन्तर, इकतारा, रावणहत्था, सारंगी, कामायचा, रबाब, सुरमंडल आदि।
👉 घन वाद्य — मंजीरा, झांझ, करताल, खड़ताल, घंटा, डंडिया, लेजिम, घुँघरू आदि।
👉 सुषिर वाद्य — अलगोजा, शहनाई, बांसुरी, पूंगी, मोरचंग, शंख, नागफनी, रणभेरी आदि।
👉 शहनाई/सुरनाई (सुषिर वाद्य) — यह शीशम या सागवान की लकड़ी से बनी होती है, आकृति चिलम जैसी होती है, जिसमें 8 छेद होते हैं। प्रसिद्ध वादक बिस्मिल्ला खाँ को वर्ष 2001 में भारत रत्न मिला।
👉 अलगोजा (सुषिर वाद्य) — राजस्थान का प्रसिद्ध वाद्य, बाँसुरी के समान। रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से अलगोजा बजाते हैं। प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक। इसे भील व कालबेलिया जातियाँ बजाती हैं।
👉 नागफनी (सुषिर वाद्य) — कुमाऊँ, गुजरात, राजस्थान में प्रचलित। इसका आकार सर्पाकार होता है और धातु की रंगीन जीभ होती है। इसका उपयोग तांत्रिक अनुष्ठान, युद्ध, शादियों में किया जाता है।
👉 कामायचा (तत् वाद्य) — जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र का लोकप्रिय वाद्य। आकार में सारंगी जैसा। इसमें 27 तार (बकरी की आँतों और घोड़े के बाल से बने), साथ में 2 मोर और 9 मोरनियाँ। इसे मांगणियार कलाकार बजाते हैं। प्रसिद्ध वादक कमल साकर खाँ।
"कमायचा" नाम का वाद्य राजस्थान के किस सम्प्रदाय के द्वारा बजाया जाता है ?
[संग्रहाध्यक्ष पुरातत्व विभाग 19.06.2024]
👉 कामायचा — माँगणियार कलाकारों द्वारा अधिक प्रयोग किया जाता है; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कामायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर-बाड़मेर क्षेत्र का लोकप्रिय वाद्य; आकार में सारंगी जैसा; इसमें 27 तार (बकरी की आँतों व घोड़े के बालों से बने) होते हैं; दो मोर व नौ मोरनियाँ;
जहूर खां मेवाती किस लोक वाद्य के पारंगत कलाकार हैं ?
[EO RO (Re Exam) 23 मार्च 2025]
👉 भपंग — यह मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य है; अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार — जहूर खाँ।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 तत् वाद्य; कटे हुए तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है; चमड़े में छेद कर तार को खूंटी से बाँधा जाता है; काँख में दबाकर तांत को खींचकर या ढीला छोड़कर, लकड़ी के टुकड़े से बजाया जाता है;
वाद्य यंत्रों के संबंध में कौनसा कथन सत्य है ?
(A) चौतारा को करताल, मंजीरा और चिमटे के साथ कामड़ जाति द्वारा बजाया जाता है।
(B) कामायचा को माँगणियार बजाते हैं।
(C) जंतर को मेवाड़ के राव तथा भाट, लोक देवता रामदेवजी की प्रशंसा में बजाते हैं।
[अन्वेषण उत्खनन अधिकारी 19.06.2024]
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा के समान; दो तुम्बे, बीच में बाँस की लम्बी नली, 4 तार; उंगलियों से आघात कर बजाया जाता है; खड़े होकर गले में लटकाकर वादन; गूजर भोपों में प्रचलित; देवनारायण की फड़ व बगडावतो में प्रयोग।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कामायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर-बाड़मेर का लोकप्रिय वाद्य; स्वरूप में सारंगी जैसा; 27 तार (बकरी की आँतों व घोड़े के बाल से); दो मोर, नौ मोरनियाँ; माँगणियार कलाकार इसका प्रयोग करते हैं; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
👉 चौतारा — चार तारों वाला वाद्य; आकार में सितार या तानपूरा जैसा; कुण्डी लकड़ी की बनी होती है; तारों का क्रम उल्टा होता है; इसके साथ खड़ताल, मंजीरा, चिमटा आदि वाद्य बजते हैं; कामड़ जाति, नाथपंथी, रामदेवजी के भजन गाने वाले इसका प्रयोग करते हैं।
निम्नलिखित वाद्यों में से कौन-सा वाद्य तार वाद्य है ?
[स्टेनोग्राफर (RPSC) 2011]
👉 रावणहत्था — भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर तैयार; बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े के बालों से) से वायलिन की तरह बजाते हैं; गज के सिरे पर घुँघरू; पाबूजी की फड़ में प्रयोग होता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर बजाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; राजस्थान के कई जिलों में लोकप्रिय; भील व कालबेलिया जातियों में प्रचलित।
👉 झांझ — मंजीरे का बड़ा रूप; 30 सेमी लकड़ी पर लोहे के गोल टुकड़े; एक हाथ से दो झांझ बजाए जाते हैं; शेखावाटी के कच्छी घोड़ी नृत्य में उपयोग।
👉 सतारा — सुषिर वाद्य; अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रित वाद्य; दो लंबी बांसुरियाँ; एक आधार स्वर, दूसरी पर 6 छेद; इच्छित स्वर परिवर्तन संभव; जैसलमेर-बाड़मेर के गड़रिया व मेघवाल जाति में प्रचलित।
पाबूजी के भोपों का वाद्ययंत्र है -
[सहायक कृषि अधिकारी 27.08.2022]
👉 रावण हत्था — वाद्ययंत्र; भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर, बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े के बालों से) से बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू लगे होते हैं; पाबूजी की फड़ में उपयोग।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 मोरचंग — लोहे/पीतल से बना; मोर की आकृति; बीच में पतला तार; मुँह में रखकर व अंगुली से बजाया जाता है; चरवाहों द्वारा मनोरंजन हेतु; अन्य नाम — माउथहार्प, आदि।
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; बांसुरी जैसा; 4-7 छेद; दो अलगोजे एक साथ बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी प्रसिद्ध वादक; प्रमुख क्षेत्र — राजस्थान; भील व कालबेलिया में प्रचलित।
👉 खड़ताल — कैर-बबूल की लकड़ी में पीतल की तश्तरियाँ; टकराने से ध्वनि; इकतारे के साथ बजाई जाती है; मांगणियार जाति का वाद्य; प्रसिद्ध कलाकार — स्व. सद्दीक खाँ।
चौतारा, भपंग व कामयाचा नामक लोक वाद्य हैं :-
[सहायक कृषि अधिकारी 25.04.2018]
👉 चौतारा, भपंग, कामायचा — तत् वाद्य हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 इस श्रेणी में आते हैं — जन्तर, इकतारा, रावणहत्था, सारंगी, चिकारा, दो तारा, भपंग, अपंग, कमठ, भीलों की कौड़ी, पावरा, कामायचा, दुकाका, केनरा, बोली, सुरमण्डल, चौतारा, सुरिन्दा, रबाज/रवाज, रबाब, तन्दूरा, निशान, गूजरी।
मुँह से बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है
[PTI GRADE -II & III (RPSC) 2013]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य; बांसुरी के समान; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर एक साथ बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में लोकप्रिय।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 कामायचा — तत् वाद्य यंत्र; जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में लोकप्रिय; सारंगी जैसा; 27 तार — बकरी की आँतों व घोड़े के बाल से बने; दो मोर व नौ मोरनियाँ होती हैं; माँगणियार कलाकार बजाते हैं; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
👉 खंजरी — आम की लकड़ी से बनी; एक तरफ चमड़ा मढ़ा होता है; घेरा चार अंगुल चौड़ा; दाहिने हाथ से पकड़कर, बाएँ हाथ से बजाई जाती है; कामड़, भील, नाथ, कालबेलिया जातियाँ उपयोग करती हैं।
👉 खड़ताल — कैर व बबूल की लकड़ी के दो टुकड़े; बीच में पीतल की गोल तश्तरियाँ लगी होती हैं; लकड़ी के टुकड़ों के टकराने से ध्वनि; इकतारे के साथ बजाई जाती है; बाड़मेर-जैसलमेर की मांगणियार जाति का प्रमुख वाद्य; प्रसिद्ध कलाकार — स्व. सद्दीक खाँ मांगणियार।
निम्नलिखित में से कौनसा/से सुषिर वाद्य यंत्र है/हैं ?
(A) अलगोजा
(B) बांकिया
(C) सतारा
[वरिष्ठ अध्यापक (ग्रुप- C) 09.09.2025]
नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए
कूट -
👉 अलगोजा एक पारंपरिक सुषिर वाद्य है, जिसमें दो नलिकाओं में फूँक मारकर स्वर उत्पन्न किया जाता है।
👉 बांकिया भी हवा फूँककर बजाया जाने वाला सुषिर वाद्य है।
👉 सतारा दो ऊर्ध्व बांसुरियों से मिलकर बना सुषिर वाद्य है, जिसे फूँक मारकर ही बजाया जाता है।
✍️ सही उत्तर है – (A), (B) और (C)
निम्नलिखित में से कौनसा तत् वाद्य यंत्र नहीं है ?
[सहायक सांख्यिकी अधि. 25.08.2024]
👉 बांकिया — सुषिर वाद्य; पीतल से निर्मित; वक्राकार होने से बांकिया कहलाता है; मांगलिक अवसरों व त्योहारों पर, मंदिरों में ढोल के साथ बजाया जाता है; गाँवों में सरगरा जाति द्वारा बजाया जाता है।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 भपंग — तुम्बे पर चमड़ा मढ़कर तैयार; चमड़े में छेद कर तार को खूंटी से बाँधते हैं; काँख में दबाकर तांत खींचकर लकड़ी से बजाते हैं; मेवात क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य; प्रसिद्ध कलाकार — जहर खाँ।
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा जैसा; दो तुम्बे, बाँस की नली, 4 तार; गले में लटकाकर बजाते हैं; गूजर भोपों द्वारा देवनारायण की फड़ व बगडावतो की कथा में प्रयोग।
निम्नलिखित में से कौन सा तंत्र वाद्य नहीं है।
सहायक आचार्य [22.09.2021]
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य; बांसुरी के समान; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर एक साथ बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) नाक से बजाते हैं; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में लोकप्रिय।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 रवाज — तत् वाद्य; सारंगी श्रेणी का वाद्य; 12 तार — 4 तांत के, 1 सन की डोरी का, 8 तरबों के; मेवाड़ क्षेत्र में राव व भाटों में प्रचलित।
👉 जन्तर — तत् वाद्य; वीणा जैसा; दो तुम्बे, बीच में बाँस की लम्बी नली, 4 तार; खड़े होकर गले में लटकाकर बजाया जाता है; गूजर भोपों में प्रचलित; देवनारायण की फड़ के वाचन व बगडावतो की कथा में प्रयोग।
👉 कामायचा — तत् वाद्य; जैसलमेर व बाड़मेर क्षेत्र में लोकप्रिय; सारंगी के समान; 27 तार — बकरी की आँतों व घोड़े के बाल से बने; दो मोर व नौ मोरनियाँ होती हैं; माँगणियार कलाकार बजाते हैं; प्रसिद्ध वादक — कमल साकर खाँ।
सूची - I एवं सूची -II को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिये गये कूट में से सही उत्तर चुनिए
सूची-I सूची -II
(लोक वाद्य यंत्र) (प्रख्यात कलाकार)
(A) भपंग (i) सदीक खाँ
(B) नड़ (ii) ज़हूर खाँ
(C) अलगोजा (iii) कर्णा भील
(D) खड़ताल (iv) रामनाथ चौधरी
[RAS Pre. 27.10.2021]
कूट -
सही उत्तर - A-(ii), B-(iii), C-(iv), D-(i)
|
प्रख्यात कलाकार |
लोक वाद्य यंत्र |
|
नड़ वादक |
करमा भील |
|
अलगोजा |
रामनाथ चौधरी |
|
भपंग |
ज़हूर खाँ |
|
खड़ताल |
सदीक खाँ |
Additional Information
|
रवि शंकर |
सितार |
|
सितार वादक |
आमिर खान |
|
वीणा वादक |
रजब अली खान |
|
मांड गायक |
अल्लाह जिलाई बाई |
निम्न में से कौनसा सुषिर वाद्य नहीं है ?
[कृषि अधिकारी 29.08.2022]
👉 रवाज — तत् वाद्य; सारंगी श्रेणी का वाद्य; कुल 12 तार — 4 तांत के, 1 सन की डोरी का, 8 तरबों के; मेवाड़ क्षेत्र में राव व भाटों में प्रचलित।
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 अलगोजा — सुषिर वाद्य; राजस्थान का लोकप्रिय लोक वाद्य; 4-7 छेद; दो अलगोजे मुँह में रखकर बजाए जाते हैं; रामनाथ चौधरी (पदमपुरा, जयपुर) प्रसिद्ध वादक; प्रमुख क्षेत्र — जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक; भील व कालबेलिया जातियों में प्रचलित।
👉 मशक — सुषिर वाद्य; चमड़े से निर्मित; मुँह से हवा भरकर नीचे लगी नली से ध्वनि निकाली जाती है; ध्वनि पूंगी जैसी; पूर्व में विवाह अवसरों पर उपयोग, अब पुलिस व सुरक्षा बलों के बैंड में प्रयोग होता है।
👉 नड़ — सुषिर वाद्य; लगभग ढाई फीट लंबा; कैर/कगौर की लकड़ी से निर्मित; 4-6 छेद; पश्चिमी राजस्थान के चरवाहों व भोपों में प्रचलित; प्रसिद्ध कलाकार — करणा राम भील (जैसलमेर); राजस्थान सरकार द्वारा सम्मानित, बाद में पाकिस्तानियों द्वारा हत्या।
राजस्थान के आदिवासी पर्वतीय क्षेत्रों के पटेल्या, बीछियो और लालर लोक गीतों के गायन के समय कौनसा लोक वाद्य बजाया जाता है ?
[Technical Assistant 07.07.2025]
👉 राजस्थान के आदिवासी पर्वतीय क्षेत्रों में पटेल्या, बीछियो और लालर जैसे लोकगीत गाए जाते समय मादल वाद्ययंत्र बजाया जाता है।
👉 मादल एक ढोलनुमा प्राचीन वाद्य है, जो मृदंग के समान दिखाई देता है।
👉 इसका प्रयोग विशेष रूप से भील, गरासिया आदि आदिवासी समुदायों द्वारा किया जाता है।
👉 गवरी नृत्य और गवरी नाटक जैसे पारंपरिक प्रदर्शनों में भी मादल का महत्त्वपूर्ण उपयोग होता है।
✍️ सही उत्तर है – मादल
"डेरू" क्या है ?
[अनुसंधान अधिकारी पुरा. 04.08.2024]
👉 डेरू — वाद्य यंत्र; आम की लकड़ी से निर्मित; दोनों ओर बारीक चमड़ा मढ़ा होता है; डोरियों से कसा जाता है; एक हाथ से पकड़कर डोरियों से कसाव व ढील किया जाता है, दूसरे हाथ से पतली डंडी से बजाया जाता है
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 इसे झाड़ पीर व गोगाजी के भक्तों द्वारा अधिक बजाया जाता है।
मादल किस तरह का लोक वाद्ययंत्र है?
[Junior Chemist PHED 01.02.2026]
🔹 व्याख्या
👉
मादल
एक प्रकार का
ढोलकनुमा
वाद्य
है।
👉
इसमें
चमड़ा
मढ़ा
होता है।
👉
इसलिए
यह अवनद्ध
वाद्य
श्रेणी में
आता है।
✍️ सही उत्तर है – अवनद्ध वाद्य
'रावण हत्था' क्या है ?
[SI (मोटर वाहन) 2013]
👉 रावण हत्था — वाद्य यंत्र; भोपों का प्रमुख वाद्य; नारियल की कटोरी पर चमड़ा मढ़कर तैयार; बाँस की डांड में 9 तार; गज (घोड़े की पूँछ के बालों से) से वायलिन की तरह बजाया जाता है; गज के सिरे पर घुँघरू लगे होते हैं
📝 अतिरिक्त जानकारी
👉 पाबूजी की फड़ के वाचन में इसका प्रयोग होता है।