मध्यकालीन राजस्थान में हाट बाज़ारों के व्यावसायियों से स्थानीय अधिकारियों द्वारा तरकारियों पर निम्न में से कौन सा कर लिया जाता था ?
[Asst. Prof. (History-II) 10.12.2025]
🔹 व्याख्या
👉
मध्यकाल
में हाट-बाज़ार
व्यापार पर
कर लिया जाता
था।
👉
स्थानीय
अधिकारी तरकारियों
पर विशेष कर
लगाते थे।
👉
इस
कर को ईंछ
कहा जाता था।
👉
इसलिए
यह कर सब्ज़ी
व्यापार
से संबंधित
था।
✍️ सही उत्तर है – ईंछ
मेवाड़ में सामंतों द्वारा दिया जाने वाला 'गनीम बराड़' कर था -
[Asst. Prof. (History) 17.05.2024]
👉 मेवाड़ राज्य में सामंतों पर कई प्रकार के कर लगाए जाते थे।
👉 इनमें एक विशेष कर गनीम बराड़ कहलाता था।
👉 यह कर केवल युद्ध की स्थिति में लिया जाता था।
👉 इसका उद्देश्य युद्ध के समय राज्य की आर्थिक आवश्यकता पूरी करना था।
✍️ सही उत्तर है – युद्ध के अवसर पर दिया जाने वाला कर
भरतु रेख” से तात्पर्य था -
[Asst. Prof. (History) 24.09.2021]
👉 मारवाड़ की सामंती व्यवस्था में सामंतों से राजस्व वसूला जाता था।
👉 राजा द्वारा जागीर के पट्टे में अनुमानित आय को पट्टा रेख कहा जाता था।
👉 सामंत द्वारा वास्तविक रूप से खजाने में जमा की जाने वाली राशि भरतु रेख कहलाती थी।
👉 यह राशि सदैव पट्टा रेख से कम या बराबर होती थी।
✍️ सही उत्तर है – राजस्व की वास्तविक राशि जिसे सामन्त राजकीय कोष में जमा कराता था
19वीं सदी के राजपूताना में निम्नलिखित में से किस श्रेणी की भूमि पर कर नहीं लगता था?
(i) भूम
(ii) सासन
(iii) खालसा
(iv) जागीर
सही उत्तर विकल्प चुनें -
[Asst. Prof. (History) 17.05.2024]
👉 राजपूताना में भूमि को कई श्रेणियों में बाँटा गया था।
👉 भोम भूमि सेवा के बदले दी जाती थी और इस पर कोई कर नहीं लगता था।
👉 सासन भूमि मंदिरों, मस्जिदों, ब्राह्मणों व कवियों को दी गई कर-मुक्त भूमि थी।
👉 जबकि खालसा और जागीर भूमि पर कर वसूला जाता था।
✍️ सही उत्तर है – केवल (i) और (ii)
रियासत कालीन 'अड़सट्टा' क्या है ?
[सहायक पुरालेखपाल 03.08.2024]
👉 जयपुर राज्य में भूमि सम्बन्धी रिकॉर्ड को विशेष नाम दिया गया।
👉 इसे अड़सट्टा कहा जाता था, जो भूमि का विस्तृत विवरण रखता था।
👉 इसमें परगनों के मौजे, उनकी भूमि व पैदावार का विवरण रहता था।
👉 यह तोजी वरको के रूप में संपूर्ण आय-व्यय का लेखा था।
✍️ सही उत्तर है – जयपुर राज्य के परगनों की आय-व्यय का रिकॉर्ड
' बारह कोटड़ी' नामक सामंती व्यवस्था का सम्बन्ध किस राज्य से है?
[Asst. Prof. (History) 30.06.2016]
👉 कछवाहा शासक पृथ्वीराज के 12 पुत्रों को स्थायी जागीरें दी गईं।
👉 इन जागीरों को सामूहिक रूप से बारह कोटड़ी कहा गया।
👉 यह सामंती व्यवस्था जयपुर/आमेर राज्य से सम्बन्धित थी।
👉 इसमें चतुरभुजोत, कल्याणोत, नाथावत आदि प्रमुख शाखाएँ थीं।
✍️ सही उत्तर है – आमेर राज्य
मारवाड़ के वे सामंत, जिन्हें राजा का निकट संबंधी होने के कारण तीन पीढियों तक चाकरी और रेख देने से मुक्त रखा जाता था, कहलाते थे :
[Asst. Prof. (History) 30.06.2016]
👉 मारवाड़ राज्य की सामंती व्यवस्था में सामंतों की अलग-अलग श्रेणियाँ थीं।
👉 इनमें राजा के निकट संबंधी और छोटे भाई विशेष श्रेणी में रखे जाते थे।
👉 इन्हें जीवन-यापन हेतु जागीरें दी जाती थीं।
👉 ये सामंत तीन पीढ़ियों तक चाकरी और रेख देने से मुक्त रहते थे।
👉 ऐसे सामंतों को राजवी कहा जाता था।
✍️ सही उत्तर है – राजवी
पद 'लोटा' का तात्पर्य है
[सहायक आचार्य (इतिहास) 12.09.2024]
👉 मध्यकाल में भू-राजस्व वसूली की कई पद्धतियाँ प्रचलित थीं।
👉 इनमें एक विशेष पद्धति लाटा कहलाती थी।
👉 इसमें फसल कटाई के बाद अनाज को तौला या डोरी से नापा जाता था।
✍️ सही उत्तर है – भू-राजस्व पद्धति, जहाँ फसल की उपज राज्य तथा किसानों के बीच बाँटी जाती थी
वह कौनसा प्रथम अंग्रेजी इतिहासकार था जिसने राजस्थान की जागीदारी (फ्यूडलिज्म) व्यवस्था पर लिखा-
वरिष्ठ अध्यापक 2010 पेपर -I GK (हिन्दी)
👉 राजस्थान की सामंती व्यवस्था सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे पर आधारित थी।
👉 इसमें राजा व सामंतों के बीच भाई-बंधु जैसे सम्बन्ध रहे।
👉 इस व्यवस्था की तुलना यूरोपीय सामंतवाद से की गई।
👉 सर्वप्रथम इस पर लेखन करने वाले अंग्रेज़ इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड थे।
✍️ सही उत्तर है – कर्नल जेम्स टॉड
चारण और भाटों को शासकों द्वारा दी गई जमीन जानी जाती थी
[सहायक आचार्य (इतिहास) 12.09.2024]
👉 मध्यकाल में शासक विशेष वर्गों को कर-मुक्त भूमि प्रदान करते थे।
👉 ऐसी भूमि मंदिरों, मस्जिदों, ब्राह्मणों, कवियों तथा चारण-भाटों को दी जाती थी।
👉 इस प्रकार की दान स्वरूप भूमि को सासण भूमि या मवद-ए-माश कहा गया।
👉 इसे प्रचलित रूप से पुण्य-उदक भी कहा जाता था।
✍️ सही उत्तर है – पुण्य-उदक
प्रति बीघा भूमि की उर्वरा एवं पैदावार के आधार पर निर्धारित राजस्व कहलाता है
[Asst. Prof. (History-II) 10.12.2025]
🔹 व्याख्या
👉
भूमि
की उर्वरा
क्षमता
व पैदावार
के आधार पर कर
तय होता था।
👉
यह
कर प्रति बीघा
भूमि के
अनुसार निर्धारित
किया जाता था।
👉
इस
प्रकार के राजस्व
को बीघोडी
कहा जाता था।
👉
इसलिए
यह राजस्व उपज
आधारित
माना जाता है।
✍️ सही उत्तर है – बीघोडी
'चंवरी' कर की प्रकृति थी -
वरिष्ठ अध्यापक 2010 पेपर -I GK (संस्कृत)
👉 मध्यकाल में अनेक करों की व्यवस्था थी।
👉 पुत्र या पुत्री के विवाह के अवसर पर विशेष कर लिया जाता था।
👉 इस कर को चंवरी कर अथवा चवरी लाग कहा जाता था।
👉 यह कर किसानों से उनकी संतान के विवाह पर वसूला जाता था।
✍️ सही उत्तर है – पुत्री के विवाह पर कर
राजपूत प्रशासन के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा सही सुमेलित है ?
[Asst. Prof. (History-II) 10.12.2025]
🔹 व्याख्या
👉
राजपूत
प्रशासन में
दान-शुल्क
एक प्रकार का
कर
था।
👉
इसका
संबंध आयात-निर्यात
व्यापार से
था।
👉
यह
वस्तुओं पर
लगाया जाने
वाला सीमा
शुल्क
था।
👉
इसलिए
यह युग्म सही
सुमेलित
है।
✍️ सही उत्तर है – दान और शुल्क : आयात-निर्यात कर
राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था में 'भांजगढ़' किसे कहा जाता था ?
[Asst. Prof. (History-II) 10.12.2025]
🔹 व्याख्या
👉
भांजगढ़
राजपूत प्रशासन
का एक विशिष्ट
पद था।
👉
यह
पद मेवाड़ में
सलूम्बर
रावत से
संबंधित था।
👉
उसे
प्रधान
पद वंशानुगत
रूप से प्राप्त
था।
👉
इसलिए
भांजगढ़ सलूम्बर
रावत को
कहा जाता था।
✍️ सही उत्तर है – मेवाड़ में सलूम्बर के रावत को जिसे प्रधान का पद वंशानुगत प्राप्त था।
जोधपुर एवं बीकानेर राज्यों में जो भूमिकर नकदी में वसूल किया जाता था, उसे कहा जाता था
[Asst. Prof. (History) 17.05.2024]
👉 मध्यकाल में भूमिकर वसूलने की कई प्रणालियाँ प्रचलित थीं।
👉 जोधपुर व बीकानेर राज्यों में भूमि की उर्वरा और पैदावार के आधार पर कर लिया जाता था।
👉 जब यह कर नकदी में वसूला जाता था, तो इसे बिघोरी कहा जाता था।
👉 यह प्रणाली खासतौर पर इन दोनों राज्यों में मान्य थी।
✍️ सही उत्तर है – बिघोरी
भूमि बंदोबस्त की साद प्रथा का संबंध निम्नलिखित में से किस राज्य से है?
[Asst. Prof. (History) 30.06.2016]
👉 मध्यकाल में भू-राजस्व की कई प्रणालियाँ प्रचलित थीं।
👉 इनमें एक विशेष व्यवस्था को साद प्रथा कहा गया।
👉 इस प्रथा में किसानों के कर का आश्वासन स्थानीय महाजन से लिया जाता था।
👉 इससे किसान महाजनों पर आश्रित हो जाते थे।
👉 यह भूमि बंदोबस्त की प्रथा मुख्यतः मेवाड़ राज्य से सम्बन्धित थी।
✍️ सही उत्तर है – मेवाड़
राजपूत प्रशासन में आय और व्यय का विवरण रखने वाले अधिकारी का नाम था :
[स्कूल व्याख्याता (इतिहास) 09.01.2020]
👉 पूर्व मध्यकालीन प्रशासन में राजा को कई अधिकारी सहयोग देते थे।
👉 इनमें आय और व्यय का ब्यौरा रखने वाला अधिकारी अक्षपटलिक कहलाता था।
👉 यह अधिकारी अनुदान, भूमि-लेख और अन्य वित्तीय कार्यों का भी हिसाब रखता था।
👉 मेवाड़ के शासक अल्लट के समय एक साथ दो अक्षपटलिक होने का उल्लेख मिलता है।
✍️ सही उत्तर है – अक्षपटलिक
मध्ययुगीन राजस्थान में राजस्व भूमि के वर्गीकरण के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही नहीं है ?
[A.En (Pre) EXAM 28.09.2025]
👉 चर्णोत भूमि वह भूमि थी जो गाँव के सभी पशुओं के चरने के लिए सार्वजनिक रूप से छोड़ी जाती थी।
👉 यह भूमि चारणों को दान में दी जाने वाली भूमि नहीं थी।
👉 इसलिए दिया गया युग्म “चर्णोट – चारणों को दान में दी जाने वाली भूमि” सही नहीं है।
👉 वास्तविक रूप से चर्णोत भूमि गाँव की सार्वजनिक चरागाह भूमि मानी जाती थी।
✍️ सही उत्तर है – चर्णोट - चारणों को दान में दी जाने वाली भूमि
'हकीकत बही' का मुख्य रूप से किस राज्य से सम्बन्ध है ?
[सहायक पुरालेखपाल 03.08.2024]
👉 राजस्थान में राजाओं की दैनिक चर्या और दरबारी कार्य दर्ज किए जाते थे।
👉 इस प्रकार की विशेष बही को “हकीकत बही” कहा जाता था।
👉 इसमें शासक की गतिविधियाँ और प्रशासनिक कार्य विस्तार से लिखे जाते थे।
👉 इसका प्रमुख सम्बन्ध जोधपुर राज्य से माना जाता है।
✍️ सही उत्तर है – जोधपुर
राजस्थान में जागीर व्यवस्था के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए -
(A) राजस्थान में पचपन प्रकार की जागीर थी।
(B) गुज़ारा, उदक, सलामी, हजूरी आदि जागीर के प्रकार थे ।
(C) जागीरों के अनुदान से रियासतों में परजीवियों का एक वर्ग तैयार हो गया ।
उपर्युक्त में से कौनसा /से कथन सही है/हैं ?
[सहायक आचार्य (इतिहास) 12.09.2024]
👉 राजस्थान में भूमि को कई श्रेणियों में बाँटा गया, जिनमें जागीर महत्वपूर्ण थी।
👉 जागीर के कई प्रकार थे जैसे – गुज़ारा, उदक, सलामी, हजूरी आदि।
👉 इन जागीर अनुदानों से रियासतों में परजीवियों का एक वर्ग उत्पन्न हुआ।
👉 लेकिन पचपन प्रकार की जागीर का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
✍️ सही उत्तर है – केवल B व C
लाटा और कुंता' का संबंध है :
[Asst. Prof. (History) 30.06.2016]
👉 मध्यकाल में भू-राजस्व की कई पद्धतियाँ प्रचलित थीं।
👉 लाटा प्रणाली में फसल कटाई के बाद ढेर को तौलकर राज्य का हिस्सा लिया जाता था।
👉 कूँता प्रणाली में खड़ी फसल का अनुमान लगाकर उपज तय की जाती थी।
👉 दोनों का सम्बन्ध उपज पर कर आंकने की पद्धति से था।
✍️ सही उत्तर है – उपज पर कर आंकने की पद्धति से